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mahabharat 12.199.23: ब्राह्मण बोला, "धर्म! मुझे उन लोकों से क्या लेना-देना? आप यहाँ से सुखपूर्वक अपने धाम को लौट जाएँ। प्रभु! मैंने इस शरीर से बहुत दुःख-सुख भोग लिए हैं, अतः मैं इसे त्याग नहीं सकता।"   |   mahabharat अध्याय 12.199: जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन,राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 199: जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन,राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  12.199.23 
ब्राह्मण उवाच
किं नु लोकैर्हि मे धर्म गच्छ त्वं च यथासुखम्।
बहुदु:खसुखं देहं नोत्सृजेयमहं विभो॥ २३॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण बोला, "धर्म! मुझे उन लोकों से क्या लेना-देना? आप यहाँ से सुखपूर्वक अपने धाम को लौट जाएँ। प्रभु! मैंने इस शरीर से बहुत दुःख-सुख भोग लिए हैं, अतः मैं इसे त्याग नहीं सकता।"
 
The Brahmin said, "Dharma! What do I have to do with those worlds? Please return to your place from here happily. Lord! I have experienced a lot of pain and happiness with this body; hence I cannot give it up." 23.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)