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mahabharat 12.199.122: यदि उन लोकोंकी श्रेष्ठतामें संदेह हो और इस कारण ध्याताकी उनमें विरक्त हो जाए, तो वह उत्तम एवं शाश्वत मोक्षकी इच्छासे पुनः उसी परब्रह्ममें प्रवेश करता है ॥122॥   |   mahabharat अध्याय 12.199: जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन,राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 199: जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन,राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन  »  श्लोक 122
 
 
श्लोक  12.199.122 
अथ तत्र विरागी स गच्छति त्वथ संशयम्।
परमव्ययमिच्छन् स तमेवाविशते पुन:॥ १२२॥
 
 
अनुवाद
यदि उन लोकोंकी श्रेष्ठतामें संदेह हो और इस कारण ध्याताकी उनमें विरक्त हो जाए, तो वह उत्तम एवं शाश्वत मोक्षकी इच्छासे पुनः उसी परब्रह्ममें प्रवेश करता है ॥122॥
 
If the excellence of those worlds is doubted and for this reason the meditator becomes disinterested in them, then desiring the excellent and everlasting salvation, he again enters the same Supreme Brahma. ॥122॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)