इत्युक्त: स तदा देव्या विप्र: प्रोवाच धर्मवित्।
जप्यं प्रति ममेच्छेयं वर्धत्विति पुन: पुन:॥ १२॥
मनसश्च समाधिर्मे वर्धेताहरह: शुभे।
अनुवाद
सावित्री देवी की यह बात सुनकर धर्मात्मा ब्राह्मण ने कहा, 'अच्छा! इस मंत्र का जप करते हुए मेरी यह इच्छा बढ़ती रहे तथा मेरे मन की एकाग्रता भी दिन-प्रतिदिन बढ़ती रहे।'॥12 1/2॥
On hearing Savitri Devi say this, the pious Brahmin said, 'Good! May this desire of mine keep increasing while chanting this mantra and may the concentration of my mind also increase day by day.'॥ 12 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥