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mahabharat 12.197.6: जो मनुष्य मोहग्रस्त होकर किसी फल की इच्छा से जप करता है, वह जिस फल की कल्पना करता है, उसी के अनुरूप नरक में गिरता है ॥6॥   |   mahabharat अध्याय 12.197: जापकमें दोष आनेके कारण उसे नरककी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 197: जापकमें दोष आनेके कारण उसे नरककी प्राप्ति  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.197.6 
अभिध्यापूर्वकं जप्यं कुरुते यश्च मोहित:।
यत्राभिध्यां स कुरुते तं वै निरयमृच्छति॥ ६॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य मोहग्रस्त होकर किसी फल की इच्छा से जप करता है, वह जिस फल की कल्पना करता है, उसी के अनुरूप नरक में गिरता है ॥6॥
 
He who is deluded and performs Japa with the desire for some fruit, falls into the hell corresponding to the fruit he thinks about. ॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)