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mahabharat 12.197.4: जो बिना किसी संकोच के जप करता है और मन्त्र के प्रति कोई प्रेम या प्रसन्नता नहीं दिखाता, वह निस्संदेह नरक में जाएगा ॥4॥   |   mahabharat अध्याय 12.197: जापकमें दोष आनेके कारण उसे नरककी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 197: जापकमें दोष आनेके कारण उसे नरककी प्राप्ति  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.197.4 
अवमानेन कुरुते न प्रीयति न हृष्यति।
ईदृशो जापको याति निरयं नात्र संशय:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
जो बिना किसी संकोच के जप करता है और मन्त्र के प्रति कोई प्रेम या प्रसन्नता नहीं दिखाता, वह निस्संदेह नरक में जाएगा ॥4॥
 
He who chants without any hesitation and does not show any love or pleasure towards the mantra will undoubtedly go to hell. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)