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mahabharat 12.196.9-10h: महाराज! यहाँ जो कारण दिया गया है, उसका स्पष्टीकरण आगे किया जाएगा। सांख्य और योग, दोनों ही मार्गों में मन और इन्द्रिय संयम को आवश्यक माना गया है। 9 1/2   |   mahabharat अध्याय 12.196: जपयज्ञके विषयमें युधिष्ठिरका प्रश्न, उसके उत्तरमें जप और ध्यानकी महिमा और उसका फल   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 196: जपयज्ञके विषयमें युधिष्ठिरका प्रश्न, उसके उत्तरमें जप और ध्यानकी महिमा और उसका फल  »  श्लोक 9-10h
 
 
श्लोक  12.196.9-10h 
यथा संश्रूयते राजन् कारणं चात्र वक्ष्यते॥ ९॥
मन:समाधिरत्रापि तथेन्द्रियजय: स्मृत:।
 
 
अनुवाद
महाराज! यहाँ जो कारण दिया गया है, उसका स्पष्टीकरण आगे किया जाएगा। सांख्य और योग, दोनों ही मार्गों में मन और इन्द्रिय संयम को आवश्यक माना गया है। 9 1/2
 
King! The reason given here will be explained later. In both the paths of Sankhya and Yoga, mind control and sense control are considered essential. 9 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)