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mahabharat 12.196.3: भरतनन्दन! अब मैं यह सुनना चाहता हूँ कि जप करने वालों को किस प्रकार फल मिलता है? जप करने वालों ने जप का क्या फल बताया है, अथवा जप करने वाले पुरुष किन लोकों में स्थान पाते हैं?॥3॥   |   mahabharat अध्याय 12.196: जपयज्ञके विषयमें युधिष्ठिरका प्रश्न, उसके उत्तरमें जप और ध्यानकी महिमा और उसका फल   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 196: जपयज्ञके विषयमें युधिष्ठिरका प्रश्न, उसके उत्तरमें जप और ध्यानकी महिमा और उसका फल  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.196.3 
जापकानां फलावाप्तिं श्रोतुमिच्छामि भारत।
किं फलं जपतामुक्तं क्व वा तिष्ठन्ति जापका:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
भरतनन्दन! अब मैं यह सुनना चाहता हूँ कि जप करने वालों को किस प्रकार फल मिलता है? जप करने वालों ने जप का क्या फल बताया है, अथवा जप करने वाले पुरुष किन लोकों में स्थान पाते हैं?॥3॥
 
Bharatanandan! Now I wish to hear how those who chant get the fruits? What is the fruit of chanting told by those who chant or in which worlds do the men who chant get a place?॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)