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mahabharat 12.196.22: अथवा यदि वह परब्रह्म के मिलन को प्राप्त नहीं करना चाहता, तो वह स्वर्ग के मार्ग पर ही रहकर ऊपर के लोकों की यात्रा करता है, अर्थात् परब्रह्म परमात्मा के परम धाम को चला जाता है। इस संसार में कहीं भी पुनः जन्म नहीं लेता।   |   mahabharat अध्याय 12.196: जपयज्ञके विषयमें युधिष्ठिरका प्रश्न, उसके उत्तरमें जप और ध्यानकी महिमा और उसका फल   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 196: जपयज्ञके विषयमें युधिष्ठिरका प्रश्न, उसके उत्तरमें जप और ध्यानकी महिमा और उसका फल  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  12.196.22 
अथवा नेच्छते तत्र ब्रह्मकायनिषेवणम्।
उत्क्रामति च मार्गस्थो नैव क्वचन जायते॥ २२॥
 
 
अनुवाद
अथवा यदि वह परब्रह्म के मिलन को प्राप्त नहीं करना चाहता, तो वह स्वर्ग के मार्ग पर ही रहकर ऊपर के लोकों की यात्रा करता है, अर्थात् परब्रह्म परमात्मा के परम धाम को चला जाता है। इस संसार में कहीं भी पुनः जन्म नहीं लेता।
 
Or if he does not want to attain the union of Parabrahma, then he remains on the path of heaven and travels to the upper worlds, that is, he goes to the supreme abode of Parabrahma Paramatma. Does not take birth again anywhere in this world.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)