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mahabharat 12.196.20: वह सदैव ध्यान की क्रिया में लगा रहता है, एकाग्र होकर ध्यान के द्वारा ही तत्त्व का निश्चय करता है, ध्यान में समाधिस्थ हो जाता है और धीरे-धीरे ध्यान की क्रिया को त्याग देता है ॥20॥   |   mahabharat अध्याय 12.196: जपयज्ञके विषयमें युधिष्ठिरका प्रश्न, उसके उत्तरमें जप और ध्यानकी महिमा और उसका फल   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 196: जपयज्ञके विषयमें युधिष्ठिरका प्रश्न, उसके उत्तरमें जप और ध्यानकी महिमा और उसका फल  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  12.196.20 
ध्यानक्रियापरो युक्तो ध्यानवान् ध्याननिश्चय:।
ध्याने समाधिमुत्पाद्य तदपि त्यजति क्रमात्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
वह सदैव ध्यान की क्रिया में लगा रहता है, एकाग्र होकर ध्यान के द्वारा ही तत्त्व का निश्चय करता है, ध्यान में समाधिस्थ हो जाता है और धीरे-धीरे ध्यान की क्रिया को त्याग देता है ॥20॥
 
He remains always engaged in the activity of meditation, becomes focused and determines the essence only through meditation, becomes samadhi (samadhi) in meditation and gradually gives up the activity of meditation. 20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)