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mahabharat 12.196.10-12: सत्य, अग्निहोत्र, एकांतवास, ध्यान, तप, साहस, क्षमा, संयम, संयमी भोजन, विषयों का संकोच, मितभाषी और लज्जा - यह प्रवर्तक यज्ञ है। अब निवर्तक यज्ञ का वर्णन सुनो; जिसके अनुसार जप करने वाले ब्रह्मचारी भक्त के सभी कर्म नष्ट हो जाते हैं (अर्थात् उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है)। 10-12॥   |   mahabharat अध्याय 12.196: जपयज्ञके विषयमें युधिष्ठिरका प्रश्न, उसके उत्तरमें जप और ध्यानकी महिमा और उसका फल   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 196: जपयज्ञके विषयमें युधिष्ठिरका प्रश्न, उसके उत्तरमें जप और ध्यानकी महिमा और उसका फल  »  श्लोक 10-12
 
 
श्लोक  12.196.10-12 
सत्यमग्निपरीचारो विविक्तानां च सेवनम्॥ १०॥
ध्यानं तपो दम: क्षान्तिरनसूया मिताशनम्।
विषयप्रतिसंहारो मितजल्पस्तथा शम:॥ ११॥
एष प्रवर्तको यज्ञो निवर्तकमथो शृणु।
यथा निवर्तते कर्म जपतो ब्रह्मचारिण:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
सत्य, अग्निहोत्र, एकांतवास, ध्यान, तप, साहस, क्षमा, संयम, संयमी भोजन, विषयों का संकोच, मितभाषी और लज्जा - यह प्रवर्तक यज्ञ है। अब निवर्तक यज्ञ का वर्णन सुनो; जिसके अनुसार जप करने वाले ब्रह्मचारी भक्त के सभी कर्म नष्ट हो जाते हैं (अर्थात् उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है)। 10-12॥
 
Truth, Agnihotra, solitude, meditation, penance, courage, forgiveness, abstinence, moderate food, shyness of subjects, reticent speech and shame - this is the promoting yagya. Now listen to the description of Nivartaka Yagya; According to which, all the deeds of the celibate devotee who chants are destroyed (that is, he attains salvation). 10-12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)