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mahabharat 12.195.6-7: योग को जानने वाला समर्थ पुरुष कानों से शब्द न सुने, त्वचा से स्पर्श न अनुभव करे, नेत्रों से रूप न देखे और जिह्वा से स्वाद न ग्रहण करे तथा ध्यान द्वारा समस्त गन्धनीय पदार्थों का त्याग कर दे तथा मन में भी इन पाँचों इन्द्रियों को मथने वाले पदार्थों की कभी इच्छा न करे ॥6-7॥   |   mahabharat अध्याय 12.195: ध्यानयोगका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 195: ध्यानयोगका वर्णन  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  12.195.6-7 
शब्दं न विन्देच्छ्रोत्रेण स्पर्शं त्वचा न वेदयेत्।
रूपं न चक्षुषा विद्याज्जिह्वया न रसांस्तथा॥ ६॥
घ्रेयाण्यपि च सर्वाणि जह्याद् ध्यानेन योगवित्।
पञ्चवर्गप्रमाथीनि नेच्छेच्चैतानि वीर्यवान्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
योग को जानने वाला समर्थ पुरुष कानों से शब्द न सुने, त्वचा से स्पर्श न अनुभव करे, नेत्रों से रूप न देखे और जिह्वा से स्वाद न ग्रहण करे तथा ध्यान द्वारा समस्त गन्धनीय पदार्थों का त्याग कर दे तथा मन में भी इन पाँचों इन्द्रियों को मथने वाले पदार्थों की कभी इच्छा न करे ॥6-7॥
 
A capable person who knows Yoga should not hear the sound through the ears, should not experience the touch through the skin, should not see the form through the eyes and should not accept the tastes through the tongue and through meditation should give up all the smellable things and should never desire even in the mind these things which churn the five senses. 6-7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)