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mahabharat 12.195.4-5: ध्यानयोग के साधकों को शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वों से रहित, सदा सत्वगुण में स्थित, सब प्रकार के दोषों से रहित तथा शौच और संतोष आदि के नियमों में सजग रहना चाहिए। जो स्थान असंग (सब प्रकार के सुखों से रहित), ध्यान-विरोधी विषयों से रहित और मन को शांति देने वाला हो, उस स्थान में इन्द्रियों को विषयों से हटाकर वृक्ष के समान स्थिर होकर बैठकर मन को एकाग्र करके भगवान् में मन लगाना चाहिए। 4-5॥   |   mahabharat अध्याय 12.195: ध्यानयोगका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 195: ध्यानयोगका वर्णन  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  12.195.4-5 
निर्द्वन्द्वा नित्यसत्त्वस्था विमुक्ता नियमस्थिता:।
असङ्गान्यविवादीनि मन:शान्तिकराणि च॥ ४॥
तत्र ध्यानेन संश्लिष्टमेकाग्रं धारयेन्मन:।
पिण्डीकृत्येन्द्रियग्राममासीन: काष्ठवन्मुनि:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
ध्यानयोग के साधकों को शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वों से रहित, सदा सत्वगुण में स्थित, सब प्रकार के दोषों से रहित तथा शौच और संतोष आदि के नियमों में सजग रहना चाहिए। जो स्थान असंग (सब प्रकार के सुखों से रहित), ध्यान-विरोधी विषयों से रहित और मन को शांति देने वाला हो, उस स्थान में इन्द्रियों को विषयों से हटाकर वृक्ष के समान स्थिर होकर बैठकर मन को एकाग्र करके भगवान् में मन लगाना चाहिए। 4-5॥
 
The aspirants of Dhyanayoga should be free from conflicts like cold and heat, always situated in Sattva Guna, free from all types of defects and should remain alert in the rules of toilet and satisfaction etc. In a place which is asang (void of all kinds of pleasures), free from things that are opposed to meditation and gives peace to the mind, in that place, after withdrawing the senses from the objects, sit as steady as a tree and concentrate the mind and concentrate on God. 4-5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)