श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 194: अध्यात्मज्ञानका निरूपण  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  12.194.48 
एवं स्वभावमेवैतत् स्वबुद्धॺा विहरेन्नर:।
अशोचन्नप्रहृष्यंश्च समो विगतमत्सर:॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
यह आत्मतत्त्व बुद्धि का ऐसा अनासक्त और शुद्ध स्वरूप है - ऐसा बुद्धि के द्वारा निश्चय करके बुद्धिमान पुरुष को सुख, शोक और आसक्ति-दोष से रहित होकर सर्वत्र समभाव से विचरण करना चाहिए ॥48॥
 
This self-principle is such an unattached and pure form of intellect - having decided through his intellect that the wise man should be free from joy, sorrow and attachment-fault and should move everywhere with equanimity. 48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)