एवं स्वभावमेवैतत् स्वबुद्धॺा विहरेन्नर:।
अशोचन्नप्रहृष्यंश्च समो विगतमत्सर:॥ ४८॥
अनुवाद
यह आत्मतत्त्व बुद्धि का ऐसा अनासक्त और शुद्ध स्वरूप है - ऐसा बुद्धि के द्वारा निश्चय करके बुद्धिमान पुरुष को सुख, शोक और आसक्ति-दोष से रहित होकर सर्वत्र समभाव से विचरण करना चाहिए ॥48॥
This self-principle is such an unattached and pure form of intellect - having decided through his intellect that the wise man should be free from joy, sorrow and attachment-fault and should move everywhere with equanimity. 48॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥