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mahabharat 12.194.46: जो सांसारिक कर्मों का त्याग करके अपने आत्मस्वरूप में लीन रहता है, वह ध्यानस्थ मुनि समस्त प्राणियों का आत्मा हो जाता है और परम मोक्ष को प्राप्त करता है ॥ 46॥   |   mahabharat अध्याय 12.194: अध्यात्मज्ञानका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 194: अध्यात्मज्ञानका निरूपण  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  12.194.46 
त्यक्त्वा य: प्राकृतं कर्म नित्यमात्मरतिर्मुनि:।
सर्वभूतात्मभूस्तस्मात् स गच्छेदुत्तमां गतिम्॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
जो सांसारिक कर्मों का त्याग करके अपने आत्मस्वरूप में लीन रहता है, वह ध्यानस्थ मुनि समस्त प्राणियों का आत्मा हो जाता है और परम मोक्ष को प्राप्त करता है ॥ 46॥
 
He who, having renounced worldly activities, remains absorbed in his own self, that meditative sage becomes the soul of all beings and attains the ultimate salvation. ॥ 46॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)