श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 194: अध्यात्मज्ञानका निरूपण  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  12.194.45 
रश्मींस्तेषां स मनसा यदा सम्यङ्‍‍नियच्छति।
तदा प्रकाशतेऽस्यात्मा घटे दीपो ज्वलन्निव॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
जब जीव बुद्धिरूपी सारथी और मनरूपी लगाम की सहायता से इन्द्रियरूपी घोड़ों को भलीभाँति वश में कर लेता है, तब उसकी आत्मा उसके भीतर घड़े में रखे हुए प्रज्वलित दीपक के समान चमकने लगती है ॥ 45॥
 
When a living being controls the horses of the senses well with the help of the charioteer of intellect and the reins of the mind, then his soul begins to shine within him like a lighted lamp kept in a pot. ॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)