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mahabharat 12.194.2: हे ब्रह्मन्! यह चर और अचर जगत् किस प्रकार उत्पन्न होता है और प्रलयकाल में किस प्रकार नष्ट हो जाता है, इसका वर्णन कृपा करके मुझसे कीजिए॥ 2॥   |   mahabharat अध्याय 12.194: अध्यात्मज्ञानका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 194: अध्यात्मज्ञानका निरूपण  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.194.2 
कुत: सृष्टमिदं विश्वं ब्रह्मन् स्थावरजङ्गमम्।
प्रलये कथमभ्येति तन्मे वक्तुमिहार्हसि॥ २॥
 
 
अनुवाद
हे ब्रह्मन्! यह चर और अचर जगत् किस प्रकार उत्पन्न होता है और प्रलयकाल में किस प्रकार नष्ट हो जाता है, इसका वर्णन कृपा करके मुझसे कीजिए॥ 2॥
 
O Brahman! How is this animate and inanimate world created and how does it get destroyed during the time of destruction; please describe this to me.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)