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mahabharat 12.193.12: ब्राह्मण को भोजन कराने के बाद बचा हुआ अन्न अमृत है। वह माता के स्तन के समान लाभकारी है। जो इसका सेवन करते हैं, वे श्रेष्ठ पुरुष परम ब्रह्म परमात्मा के वास्तविक स्वरूप को प्राप्त होते हैं ॥12॥   |   mahabharat अध्याय 12.193: शिष्टाचारका फलसहित वर्णन, पापको छिपानेसे हानि और धर्मकी प्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 193: शिष्टाचारका फलसहित वर्णन, पापको छिपानेसे हानि और धर्मकी प्रशंसा  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  12.193.12 
अमृतं ब्राह्मणोच्छिष्टं जनन्या हृदयं कृतम्।
तज्जना: पर्युपासन्ते सत्यं सन्त: समासते॥ १२॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण को भोजन कराने के बाद बचा हुआ अन्न अमृत है। वह माता के स्तन के समान लाभकारी है। जो इसका सेवन करते हैं, वे श्रेष्ठ पुरुष परम ब्रह्म परमात्मा के वास्तविक स्वरूप को प्राप्त होते हैं ॥12॥
 
The food left after feeding a Brahmin is Amrit. It is as beneficial as a mother's breast. Those who consume it, those noble men attain the true form of the Supreme Brahma, the Supreme Soul. ॥12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)