श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 193: शिष्टाचारका फलसहित वर्णन, पापको छिपानेसे हानि और धर्मकी प्रशंसा  » 
 
 
अध्याय 193: शिष्टाचारका फलसहित वर्णन, पापको छिपानेसे हानि और धर्मकी प्रशंसा
 
श्लोक 1:  युधिष्ठिर ने पूछा- हे धर्म को जानने वाले पितामह! अब मैं आपके मुख से सदाचार की विधि सुनना चाहता हूँ; क्योंकि आप सर्वज्ञ हैं॥1॥
 
श्लोक 2:  भीष्म बोले, "हे राजन! जो दुष्ट हैं, बुरे इरादे वाले हैं, बुरी बुद्धि वाले हैं और दुस्साहस पसंद करते हैं, वे दुष्टात्मा कहलाते हैं। श्रेष्ठ पुरुष वे हैं जिनमें अच्छा आचरण देखा जाता है - अच्छा आचरण ही उनका एकमात्र लक्षण है।"
 
श्लोक 3:  जो मनुष्य मार्ग में, गायों के बीच या अन्न में मल-मूत्र त्याग नहीं करते, वे श्रेष्ठ माने गए हैं ॥3॥
 
श्लोक 4:  नित्य कर्मों से निवृत्त होकर जल से कुल्ला करना चाहिए; फिर नदी में स्नान करना चाहिए और यथाशक्ति संध्या उपासना करके देवताओं आदि को हवि देना चाहिए। विद्वान पुरुष कहते हैं कि यही सब मनुष्यों का कर्तव्य है॥4॥
 
श्लोक 5:  प्रतिदिन सूर्योपासना करें। सूर्योदय के समय कभी न सोएँ। शाम और सुबह संध्याओपासना करें और गायत्री मंत्र का जाप करें। 5.
 
श्लोक 6:  हाथ-पैर और मुँह धोकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके भोजन करें। भोजन करते समय मौन रहें। परोसे गए भोजन की आलोचना न करें। चाहे वह स्वादिष्ट हो या न हो, प्रेमपूर्वक भोजन करें।
 
श्लोक 7:  भोजन के बाद, उठने से पहले हाथ धोएँ। रात को गीले पैर न सोएँ। देवर्षि नारद इसे सदाचार का लक्षण बताते हैं।
 
श्लोक 8-9:  यज्ञ-स्थल, बैल, मंदिर, चौराहा, ब्राह्मण, साधु पुरुष और चैत्य (देवता से संबंधित वृक्ष) को सदैव दाहिनी ओर रखकर चलना चाहिए। गृहस्थ के लिए घर में अतिथियों, नौकरों और संबंधियों के लिए एक ही भोजन बनाना श्रेष्ठ माना गया है।
 
श्लोक 10:  शास्त्रों में मनुष्यों के लिए दिन में केवल दो बार, सायंकाल और प्रातःकाल, भोजन करने का विधान है। इनके बीच में भोजन करने का कोई नियम नहीं है। जो इस नियम का पालन करता है, उसे उपवास का फल प्राप्त होता है॥10॥
 
श्लोक 11:  जो प्रतिदिन होम के समय हवन करता है, मासिक धर्म के समय अपनी पत्नी के पास जाता है और पराई स्त्री पर दृष्टि नहीं डालता, वह बुद्धिमान पुरुष ब्रह्मचारी के समान माना जाता है ॥11॥
 
श्लोक 12:  ब्राह्मण को भोजन कराने के बाद बचा हुआ अन्न अमृत है। वह माता के स्तन के समान लाभकारी है। जो इसका सेवन करते हैं, वे श्रेष्ठ पुरुष परम ब्रह्म परमात्मा के वास्तविक स्वरूप को प्राप्त होते हैं ॥12॥
 
श्लोक 13:  जो मनुष्य मिट्टी के ढेले तोड़ता है, तिनके तोड़ता है, नाखून चबाता है, सदा गंदे हाथ और गंदा मुंह रखता है तथा खूंटे से बंधे तोते के समान पराधीन जीवन व्यतीत करता है, उसे इस संसार में दीर्घायु नहीं मिलती ॥13॥
 
श्लोक 14:  जो मांस नहीं खाता, उसे यजुर्वेद के मन्त्रों से पवित्र किया हुआ मांस नहीं खाना चाहिए। उसे व्यर्थ मांस तथा श्राद्ध से बचा हुआ मांस भी त्याग देना चाहिए। ॥14॥
 
श्लोक 15:  अपने देश में हो या विदेश में, अपने यहाँ आए अतिथि को कभी भूखा नहीं रहने देना चाहिए। अपने कर्तव्य पालन के फलस्वरूप प्राप्त वस्तुएँ अपने बड़ों को अर्पित कर देनी चाहिए ॥15॥
 
श्लोक 16:  जब गुरुजन आएं, तो उन्हें बैठने के लिए आसन दो और उन्हें प्रणाम करो। गुरुजनों की पूजा करने से मनुष्य आयु, यश और धन से धन्य हो जाते हैं। 16॥
 
श्लोक 17:  धर्मानुसार, उसे उगते हुए सूर्य को नहीं देखना चाहिए, दूसरे की नग्न पत्नी पर दृष्टि नहीं डालनी चाहिए तथा अपनी पत्नी के मासिक धर्म के समय उसके साथ एकांत स्थान में संभोग करना चाहिए।
 
श्लोक 18:  सब तीर्थों में श्रेष्ठ है शुद्ध हृदय। सब पवित्र वस्तुओं में भी पवित्र है शुद्ध हृदय। सुसंस्कृत पुरुषों का आचरण ही श्रेष्ठ है। पंखा आदि में प्रयुक्त गाय की पूँछ के बालों का स्पर्श भी शुद्ध है, क्योंकि वह शिष्टाचार से स्वीकृत है।॥18॥
 
श्लोक 19:  जब भी किसी परिचित से मिलें, उसका कुशलक्षेम अवश्य पूछें। शास्त्रों में सुबह और शाम दोनों समय ब्राह्मणों को प्रणाम करने का निर्देश है।
 
श्लोक 20:  भगवान के मंदिर में, गौओं के बीच, ब्राह्मण के यज्ञ कार्यों में, शास्त्रों का अध्ययन करते समय और भोजन करते समय अपने दाहिने हाथ का प्रयोग करो ॥20॥
 
श्लोक 21-22h:  मनुष्य को प्रातः और सायं दोनों समय विधिपूर्वक ब्राह्मणों की पूजा (सेवा) करनी चाहिए। यह व्यापार में श्रेष्ठतम व्यापार के समान है और कृषि में श्रेष्ठ खेती के समान फलदायी है। जो मनुष्य ब्राह्मणों की पूजा करता है, उसे विविध फसलें प्राप्त होती हैं और उसे उत्तम वाहन गौ प्राप्त होता है।
 
श्लोक 22-23h:  भोजन परोसने के बाद, दानकर्ता को पूछना चाहिए कि भोजन समाप्त हुआ या नहीं। ब्राह्मण उत्तर दे कि भोजन समाप्त हो गया। इसी प्रकार, जल अर्पित करने के बाद, दानकर्ता को पूछना चाहिए कि यजमान संतुष्ट हुए या नहीं। ब्राह्मण उत्तर दे कि मैं संतुष्ट हूँ। खीर परोसने के बाद, जब यजमान पूछे कि खीर अच्छी बनी थी या नहीं? तो ब्राह्मण उत्तर दे कि खीर बहुत अच्छी बनी थी। इसी प्रकार, जौ का हलवा और खिचड़ी परोसने के बाद, प्रश्नोत्तर करने चाहिए।॥22 1/2॥
 
श्लोक 23:  हजामत बनाने, छींकने, स्नान करने और भोजन करने के बाद प्रत्येक व्यक्ति और सभी अवस्थाओं में सभी रोगियों का कर्तव्य है कि वे ब्राह्मणों को प्रणाम आदि करके उन्हें प्रसन्न करें। इससे उनकी आयु बढ़ती है॥23॥
 
श्लोक 24:  सूरज की ओर मुँह करके पेशाब मत करो। अपने मल को मत देखो। अपनी पत्नी के साथ एक ही बिस्तर पर सोना और एक ही थाली में खाना बंद करो।
 
श्लोक 25:  अपने से बड़ों को नाम लेकर या 'तू' कहकर न पुकारो। अपने से छोटे या अपनी उम्र के लोगों के लिए ऐसा करना अनुचित नहीं है। ॥25॥
 
श्लोक 26:  पापियों का हृदय, उनकी आँखों और चेहरे की विकृति उनके पापों को प्रकट कर देती है। जो लोग महापुरुषों से जान-बूझकर अपने पाप छिपाते हैं, वे गिर जाते हैं। 26.
 
श्लोक 27:  मूर्ख मनुष्य ही अपने किए हुए पापों को जान-बूझकर छिपाता है। यद्यपि मनुष्य उन पापों को नहीं देखते, तथापि देवता उन्हें देखते हैं॥27॥
 
श्लोक 28:  पापी मनुष्य का पाप, उसके पाप से छिपा हुआ, उसे पुनः पाप की ओर ले जाता है, और धर्मात्मा मनुष्य द्वारा गुप्त रखा हुआ धर्म, उसे पुनः धर्म की ओर ले जाता है।
 
श्लोक 29:  मूर्ख मनुष्य अपने किए हुए पापों को स्मरण नहीं रखता; परन्तु पाप करने वाले के पाप स्वयं ही उसके पीछे-पीछे आते रहते हैं। जैसे राहु स्वतः ही चन्द्रमा के पास पहुँच जाता है, वैसे ही मूर्ख मनुष्य के पाप भी स्वतः ही उसके पास चले आते हैं ॥29॥
 
श्लोक 30:  जो धन किसी विशेष कामना की पूर्ति की आशा से संचित किया जाता है, वह दुःख से भस्म हो जाता है; इसलिए विद्वान् लोग उसकी प्रशंसा नहीं करते; क्योंकि मृत्यु किसी की कामना पूरी करने के लिए अवसर की प्रतीक्षा नहीं करती ॥30॥
 
श्लोक 31:  बुद्धिमान पुरुष कहते हैं कि मन से किया गया धर्म सब प्राणियों के लिए उत्तम है; इसलिए मन में सब प्राणियों के कल्याण का चिन्तन करते रहना चाहिए ॥31॥
 
श्लोक 32:  केवल वैदिक विधियों का ही आश्रय लेकर अकेले ही धर्म का पालन करना चाहिए। इसमें किसी की सहायता की आवश्यकता नहीं है। अन्य कोई सहायक क्या करेगा?॥ 32॥
 
श्लोक 33:  धर्म ही मनुष्यों का भाग्य है। वही स्वर्ग में देवताओं का अमृत है। धार्मिक व्यक्ति अपने धर्म के कारण ही मृत्यु के बाद भी सदैव सुख भोगता है। 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)