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mahabharat 12.191.18: जो ब्राह्मण गृहस्थ अपने धर्म के पालन में तत्पर रहता है, खेत या बाजार में बिखरे हुए एक-एक दाने को बीनकर अपना गुजारा करता है और जो विषय-भोगों का त्याग करता है, उसके लिए स्वर्ग कोई दुर्लभ वस्तु नहीं है ॥18॥   |   mahabharat अध्याय 12.191: ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य आश्रमोंके धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 191: ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य आश्रमोंके धर्मका वर्णन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  12.191.18 
उञ्छवृत्तिर्गृहस्थो य: स्वधर्माचरणे रत:।
त्यक्तकामसुखारम्भ: स्वर्गस्तस्य न दुर्लभ:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
जो ब्राह्मण गृहस्थ अपने धर्म के पालन में तत्पर रहता है, खेत या बाजार में बिखरे हुए एक-एक दाने को बीनकर अपना गुजारा करता है और जो विषय-भोगों का त्याग करता है, उसके लिए स्वर्ग कोई दुर्लभ वस्तु नहीं है ॥18॥
 
For a Brahmin householder who is devoted to the observance of his religion and earns his living by picking up each and every grain scattered in the field or in the market and who renounces sensual pleasures, heaven is not a rare commodity. ॥18॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि भृगुभरद्वाजसंवादे एकनवत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १९१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें भृगु-भरद्वाजसंवादविषयक एक सौ इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १९१॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)