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mahabharat 12.191.15: किसी का अनादर करना, अहंकार और पाखंड करना - ये दुर्गुण भी विशेष रूप से निन्दित हैं। किसी प्राणी को कष्ट न देना, सत्य बोलना और मन में क्रोध को न आने देना - ये सभी आश्रमों के लोगों के लिए उपयोगी तप हैं।॥15॥   |   mahabharat अध्याय 12.191: ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य आश्रमोंके धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 191: ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य आश्रमोंके धर्मका वर्णन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.191.15 
अवज्ञानमहंकारो दम्भश्चैव विगर्हित:।
अहिंसा सत्यमक्रोध: सर्वाश्रमगतं तप:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
किसी का अनादर करना, अहंकार और पाखंड करना - ये दुर्गुण भी विशेष रूप से निन्दित हैं। किसी प्राणी को कष्ट न देना, सत्य बोलना और मन में क्रोध को न आने देना - ये सभी आश्रमों के लोगों के लिए उपयोगी तप हैं।॥15॥
 
Disrespecting someone, showing arrogance and hypocrisy – these vices have also been particularly condemned. Not harming any living being, speaking the truth and not allowing anger to enter the mind – these are useful penances for people of all ashrams.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)