Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.190.10: भारद्वाज ने पूछा, "प्रभु! आपने जो कहा है कि भोगों का ही सर्वोच्च स्थान है, भोग से बढ़कर तीनों लोकों का कोई फल नहीं है, आपका यह कथन हमें उचित नहीं लगता; क्योंकि जो ऋषिगण महान तप में लीन रहते हैं, यद्यपि उनके लिए यह अभीष्ट विशेष भोग प्राप्त हो सकता है, तो भी वे इसे नहीं चाहते। ऐसा सुना जाता है कि तीनों लोकों के रचयिता भगवान ब्रह्मा एकाकी रहते हैं, ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं और कभी विषय-भोगों में लिप्त नहीं होते। देवी उमा के प्रिय भगवान विश्वनाथ ने भी अपने सामने आई हुई कामवासना को भस्म करके शांत कर दिया और उसे अनंग बना दिया; इसीलिए हम कहते हैं कि महापुरुषों ने इसे कभी स्वीकार नहीं किया। उनके लिए यह विषय-भोग अर्थात् सांसारिक भोगों का सुख, सबसे बड़ा सुख नहीं है; परंतु मुझे आपके वचनों से ऐसा नहीं लगता। आपने कहा है कि इस सुख से बढ़कर कोई दूसरा फल नहीं है। संसार में कहा गया है कि फल दो प्रकार से उत्पन्न होता है। पुण्य कर्मों से सुख और पाप कर्मों से दुःख प्राप्त होता है। 10. | mahabharat अध्याय 12.190: सत्यकी महिमा, असत्यके दोष तथा लोक और परलोकके सुख-दु:खका विवेचन । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
भरद्वाज उवाच
यदेतद् भवताभिहितं सुखानां परमा स्थितिरिति न तदुपगृह्णीमो न ह्येषामृषीणां महति स्थितानामप्राप्य एष काम्यो गुणविशेषो न चैनमभिलषन्ति च तपसि श्रूयते त्रिलोककृद् ब्रह्मा प्रभुरेकाकी तिष्ठति। ब्रह्मचारी न कामसुखेष्वात्मानमवदधाति। अपि च भगवान् विश्वेश्वर उमापति: काममभिवर्तमानमनङ्गत्वेन शममनयत्। तस्माद् ब्रूमो न तु महात्मभिरयं प्रतिगृहीतो न त्वेषां तावद्विशिष्टो गुणविशेष इति। नैतद् भगवत: प्रत्येमि भगवता तूक्तं सुखान्न परमस्तीति लोकप्रवादो हि द्विविध: फलोदय: सुकृतात् सुखमवाप्यते दुष्कृताद् दु:खमिति॥ १०॥
अनुवाद
भारद्वाज ने पूछा, "प्रभु! आपने जो कहा है कि भोगों का ही सर्वोच्च स्थान है, भोग से बढ़कर तीनों लोकों का कोई फल नहीं है, आपका यह कथन हमें उचित नहीं लगता; क्योंकि जो ऋषिगण महान तप में लीन रहते हैं, यद्यपि उनके लिए यह अभीष्ट विशेष भोग प्राप्त हो सकता है, तो भी वे इसे नहीं चाहते। ऐसा सुना जाता है कि तीनों लोकों के रचयिता भगवान ब्रह्मा एकाकी रहते हैं, ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं और कभी विषय-भोगों में लिप्त नहीं होते। देवी उमा के प्रिय भगवान विश्वनाथ ने भी अपने सामने आई हुई कामवासना को भस्म करके शांत कर दिया और उसे अनंग बना दिया; इसीलिए हम कहते हैं कि महापुरुषों ने इसे कभी स्वीकार नहीं किया। उनके लिए यह विषय-भोग अर्थात् सांसारिक भोगों का सुख, सबसे बड़ा सुख नहीं है; परंतु मुझे आपके वचनों से ऐसा नहीं लगता। आपने कहा है कि इस सुख से बढ़कर कोई दूसरा फल नहीं है। संसार में कहा गया है कि फल दो प्रकार से उत्पन्न होता है। पुण्य कर्मों से सुख और पाप कर्मों से दुःख प्राप्त होता है। 10.
Bharadwaj asked, "Prabhu! What you have said that pleasures are the highest place, there is no fruit of the three worlds greater than pleasure, this statement of yours does not seem right to us; because the sages who are immersed in great penance, although this desirable special pleasure can be obtained for them, still they do not want it. It is heard that Lord Brahma, the creator of the three worlds, lives alone, follows celibacy and never indulges in sexual pleasures. Lord Vishwanath, the beloved of Goddess Uma, also pacified the lust that came in front of him by burning it and made it Anang; that is why we say that great men have never accepted it. For them this sexual pleasure, that is, the pleasure of worldly enjoyments, is not the greatest pleasure; but I do not feel so from your words. You have said that there is no other fruit greater than this pleasure. It is said in the world that the fruit is produced in two ways. Happiness is achieved by pious deeds and sorrow by sinful deeds. 10.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥