भृगुरुवाच
समिधामुपयोगान्ते यथाग्निर्नोपलभ्यते।
आकाशानुगतत्वाद्धि दुर्ग्राह्यो हि निराश्रय:॥ ५॥
अनुवाद
भृगुजी बोले - मुने ! समिधाओं के जल जाने पर अग्नि नष्ट नहीं होती । वह अव्यक्त रूप में आकाश में स्थित है, अतः उसकी प्राप्ति संभव नहीं है; क्योंकि बिना किसी आश्रय के अग्नि को ग्रहण करना अत्यंत कठिन है ॥5॥
Bhriguji said – Mune! Agni is not destroyed when the Samidhas are burnt. It is situated in the sky in an unmanifested form, hence its attainment is not possible; Because it is very difficult to absorb fire without any shelter. 5॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥