श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 187: जीवकी सत्ता तथा नित्यताको युक्तियोंसे सिद्ध करना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.187.5 
भृगुरुवाच
समिधामुपयोगान्ते यथाग्निर्नोपलभ्यते।
आकाशानुगतत्वाद्धि दुर्ग्राह्यो हि निराश्रय:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
भृगुजी बोले - मुने ! समिधाओं के जल जाने पर अग्नि नष्ट नहीं होती । वह अव्यक्त रूप में आकाश में स्थित है, अतः उसकी प्राप्ति संभव नहीं है; क्योंकि बिना किसी आश्रय के अग्नि को ग्रहण करना अत्यंत कठिन है ॥5॥
 
Bhriguji said – Mune! Agni is not destroyed when the Samidhas are burnt. It is situated in the sky in an unmanifested form, hence its attainment is not possible; Because it is very difficult to absorb fire without any shelter. 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)