चित्तस्य हि प्रसादेन हित्वा कर्म शुभाशुभम्।
प्रसन्नात्माऽऽत्मनि स्थित्वा सुखमानन्त्यमश्नुते॥ ३०॥
अनुवाद
जब मन शुद्ध हो जाता है, तब वह शुभ-अशुभ कर्मों से अपना सम्बन्ध हटाकर सुखी हो जाता है, आत्मस्थ हो जाता है और अनंत आनन्द का अनुभव करने लगता है ॥30॥
When the mind becomes pure, it removes its connection with auspicious and inauspicious deeds, becomes happy, becomes situated in the self and starts experiencing infinite joy. 30॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥