श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 184: पञ्चमहाभूतोंके गुणोंका विस्तारपूर्वक वर्णन  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  12.184.31 
रसो बहुविध: प्रोक्त ऋषिभि: प्रथितात्मभि:।
मधुरो लवणस्तिक्त: कषायोऽम्ल: कटुस्तथा॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
उदार ऋषियों ने रस के अनेक प्रकार बताए हैं - मधुर, लवण, कटु, कषाय, खट्टा और तीखा। इन छह रूपों में जो रस विस्तृत होता है, वह जलमय माना गया है॥31॥
 
Generous sages have described several types of rasa - sweet, salty, bitter, astringent, sour and pungent. The rasa that is expanded in these six forms is considered to be watery.॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)