Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.183.9: वह दिव्य वाणी इस प्रकार है: 'पूर्वकाल में अनंत आकाश पर्वत के समान निश्चल था। उसमें न चंद्रमा, न सूर्य, न वायु दिखाई देती थी। ऐसा प्रतीत होता था मानो वह सो रहा हो।॥9॥ | mahabharat अध्याय 12.183: आकाशसे अन्य चार स्थूल भूतोंकी उत्पत्तिका वर्णन । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
पुरा स्तिमितमाकाशमनन्तमचलोपमम्।
नष्टचन्द्रार्कपवनं प्रसुप्तमिव सम्बभौ॥ ९॥
अनुवाद
वह दिव्य वाणी इस प्रकार है: 'पूर्वकाल में अनंत आकाश पर्वत के समान निश्चल था। उसमें न चंद्रमा, न सूर्य, न वायु दिखाई देती थी। ऐसा प्रतीत होता था मानो वह सो रहा हो।॥9॥
That heavenly voice is as follows: 'In the past, the endless sky was as still as a mountain. Neither the moon, nor the sun, nor the wind could be seen in it. It appeared as if it was asleep.॥ 9॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥