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mahabharat 12.182.30: अग्नि, वायु, जल और पृथ्वी - इनके रंग और रूप आकाश से उत्पन्न हैं; अतः ये उससे भिन्न नहीं हैं। केवल सत्य ज्ञान के अभाव में ही इनमें भेद दिखाई देता है।   |   mahabharat अध्याय 12.182: भरद्वाज और भृगुके संवादमें जगत‍् की उत्पत्तिका और विभिन्न तत्त्वोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.182.30 
अग्निमारुततोयानां वर्णा: क्षितितलस्य च।
आकाशादवगृह्यन्ते भिद्यन्तेऽतत्त्वदर्शनात् ॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
अग्नि, वायु, जल और पृथ्वी - इनके रंग और रूप आकाश से उत्पन्न हैं; अतः ये उससे भिन्न नहीं हैं। केवल सत्य ज्ञान के अभाव में ही इनमें भेद दिखाई देता है।
 
Fire, air, water and earth- their colours and forms are derived from the sky; hence they are not different from it. It is only due to lack of true knowledge that differences are perceived among them.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)