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mahabharat 12.182.19: आकाश का ऊपरी भाग उसका सिर है, पृथ्वी उसके चरण हैं और दिशाएँ उसकी भुजाएँ हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि अचिन्त्य ब्रह्म सिद्ध पुरुषों के लिए भी अगम्य है।   |   mahabharat अध्याय 12.182: भरद्वाज और भृगुके संवादमें जगत‍् की उत्पत्तिका और विभिन्न तत्त्वोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 182: भरद्वाज और भृगुके संवादमें जगत‍् की उत्पत्तिका और विभिन्न तत्त्वोंका वर्णन  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  12.182.19 
नभश्चोर्ध्वं शिरस्तस्य क्षिति: पादौ भुजौ दिश:।
दुर्विज्ञेयो ह्यचिन्त्यात्मा सिद्धैरपि न संशय:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
आकाश का ऊपरी भाग उसका सिर है, पृथ्वी उसके चरण हैं और दिशाएँ उसकी भुजाएँ हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि अचिन्त्य ब्रह्म सिद्ध पुरुषों के लिए भी अगम्य है।
 
The upper part of the sky is his head, the earth is his feet and the directions are his arms. There is no doubt that the inconceivable Brahma is incomprehensible even to the accomplished men.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)