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mahabharat 12.181.11: अपने ही कर्मों का फल उस निधि के समान है जो कर्म दृष्टा द्वारा सुरक्षित रहती है। जब उपयुक्त समय आता है, तो काल इन कर्मों का फल जीवों तक पहुँचा देता है। ॥11॥   |   mahabharat अध्याय 12.181: शुभाशुभ कर्मोंका परिणाम कर्ताको अवश्य भोगना पड़ता है, इसका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 181: शुभाशुभ कर्मोंका परिणाम कर्ताको अवश्य भोगना पड़ता है, इसका प्रतिपादन  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  12.181.11 
स्वकर्मफलनिक्षेपं विधानपरिरक्षितम्।
भूतग्राममिमं काल: समन्तात् परिकर्षति॥ ११॥
 
 
अनुवाद
अपने ही कर्मों का फल उस निधि के समान है जो कर्म दृष्टा द्वारा सुरक्षित रहती है। जब उपयुक्त समय आता है, तो काल इन कर्मों का फल जीवों तक पहुँचा देता है। ॥11॥
 
The fruits of one's own actions are like a treasure which is protected by the karmic adrishta. When the opportune moment arrives, time brings the fruits of these actions to the living beings. ॥11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)