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mahabharat 12.18.26: राजा! जैसे लकड़ी जलाए बिना अग्नि नहीं बुझती, वैसे ही जो ब्राह्मण सदैव भिक्षा मांगता रहता है, उसे भी भिक्षा समाप्त किए बिना कभी शांति नहीं मिलती॥ 26॥   |   mahabharat अध्याय 12.18: अर्जुनका राजा जनक और उनकी रानीका दृष्टान्त देते हुए युधिष्ठिरको संन्यास ग्रहण करनेसे रोकना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 18: अर्जुनका राजा जनक और उनकी रानीका दृष्टान्त देते हुए युधिष्ठिरको संन्यास ग्रहण करनेसे रोकना  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  12.18.26 
जातवेदा यथा राजन् नादग्ध्वैवोपशाम्यति।
सदैव याचमानो हि तथा शाम्यति न द्विज:॥ २६॥
 
 
अनुवाद
राजा! जैसे लकड़ी जलाए बिना अग्नि नहीं बुझती, वैसे ही जो ब्राह्मण सदैव भिक्षा मांगता रहता है, उसे भी भिक्षा समाप्त किए बिना कभी शांति नहीं मिलती॥ 26॥
 
'King! Just as a fire cannot be extinguished unless wood is burnt, similarly a Brahmin who is always begging can never be at peace (without ending his begging).॥ 26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)