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mahabharat 12.179.32: मेरा सोने या बैठने का कोई निश्चित स्थान नहीं है। मैं स्वभावतः संयम, नियम, व्रत, सत्य और पवित्रता से युक्त हूँ। मेरे कर्मों का संचय नष्ट हो गया है। मैं प्रसन्नतापूर्वक और शुद्ध भाव से इस आजगरव्रत का पालन करता हूँ॥ 32॥   |   mahabharat अध्याय 12.179: प्रह्लाद और अवधूतका संवाद—आजगर-वृत्तिकी प्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 179: प्रह्लाद और अवधूतका संवाद—आजगर-वृत्तिकी प्रशंसा  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  12.179.32 
अनियतशयनासन: प्रकृत्या
दमनियमव्रतसत्यशौचयुक्त:।
अपगतफलसंचय: प्रहृष्टो
व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
मेरा सोने या बैठने का कोई निश्चित स्थान नहीं है। मैं स्वभावतः संयम, नियम, व्रत, सत्य और पवित्रता से युक्त हूँ। मेरे कर्मों का संचय नष्ट हो गया है। मैं प्रसन्नतापूर्वक और शुद्ध भाव से इस आजगरव्रत का पालन करता हूँ॥ 32॥
 
‘I do not have any fixed place to sleep or sit. I am naturally endowed with self-control, discipline, vows, truth and cleanliness. The accumulation of my karmic results has been destroyed. I happily and with pure intentions perform this Aajgarvrata.॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)