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mahabharat 12.179.26: मेरी बुद्धि अविचल है, मैं अपने धर्म से विचलित नहीं हुआ हूँ, मेरे सांसारिक कर्म सीमित हो गए हैं, मुझे अच्छे-बुरे का ज्ञान हो गया है, भय, राग-द्वेष, लोभ और मोह मेरे हृदय से दूर हो गए हैं और मैं पवित्र रहकर अजगर के समान इस व्रत को करता हूँ॥ 26॥   |   mahabharat अध्याय 12.179: प्रह्लाद और अवधूतका संवाद—आजगर-वृत्तिकी प्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 179: प्रह्लाद और अवधूतका संवाद—आजगर-वृत्तिकी प्रशंसा  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  12.179.26 
अचलितमतिरच्युत: स्वधर्मात्
परिमितसंसरण: परावरज्ञ:।
विगतभयकषायलोभमोहो
व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि॥ २६॥
 
 
अनुवाद
मेरी बुद्धि अविचल है, मैं अपने धर्म से विचलित नहीं हुआ हूँ, मेरे सांसारिक कर्म सीमित हो गए हैं, मुझे अच्छे-बुरे का ज्ञान हो गया है, भय, राग-द्वेष, लोभ और मोह मेरे हृदय से दूर हो गए हैं और मैं पवित्र रहकर अजगर के समान इस व्रत को करता हूँ॥ 26॥
 
'My intellect is unwavering, I have not deviated from my Dharma, my worldly activities have become limited, I have the knowledge of what is good and what is bad, fear, love-hate, greed and infatuation have vanished from my heart and I remain pure and perform this fast befitting a python.॥ 26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)