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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 177: मङ्किगीता—धनकी तृष्णासे दु:ख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति
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श्लोक 9
श्लोक
12.177.9
न चैवाविहितं शक्यं दक्षेणापीहितुं धनम्।
युक्तेन श्रद्धया सम्यगीहां समनुतिष्ठता॥ ९॥
अनुवाद
मनुष्य चाहे कितना ही चतुर क्यों न हो, वह भक्तिपूर्वक प्रयत्न करने पर भी, जो धन उसके भाग्य में नहीं है, उसे प्राप्त नहीं कर सकता।॥9॥
'No matter how clever a person is, he cannot get the wealth that is not in his destiny, even if he tries hard with devotion.॥ 9॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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