श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 177: मङ्किगीता—धनकी तृष्णासे दु:ख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  12.177.51 
यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम्।
तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हत: षोडशीं कलाम्॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
‘इस लोक में विषयों का सुख और परलोक में दिव्य तथा महान सुख, ये दोनों प्रकार के सुख तृष्णा के निरोध से होने वाले सुख के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं हैं ॥51॥
 
‘The happiness of objects in this world and the divine and great happiness in the next world, both these types of happiness are not equal to even the sixteenth part of the happiness that comes from the cessation of craving. 51॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)