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mahabharat 12.177.50: जैसे ग्रीष्म ऋतु में लोग शीतल जल वाले सरोवर में प्रवेश करते हैं, वैसे ही अब मैं परब्रह्म में स्थित हूँ, अतः शान्त हूँ, सब ओर से निर्वाण प्राप्त कर चुका हूँ। अब मुझे केवल सुख ही सुख मिल रहा है॥ 50॥   |   mahabharat अध्याय 12.177: मङ्किगीता—धनकी तृष्णासे दु:ख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 177: मङ्किगीता—धनकी तृष्णासे दु:ख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  12.177.50 
एष ब्रह्मप्रतिष्ठोऽहं ग्रीष्मे शीतमिव ह्रदम्।
शाम्यामि परिनिर्वामि सुखं मामेति केवलम्॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
जैसे ग्रीष्म ऋतु में लोग शीतल जल वाले सरोवर में प्रवेश करते हैं, वैसे ही अब मैं परब्रह्म में स्थित हूँ, अतः शान्त हूँ, सब ओर से निर्वाण प्राप्त कर चुका हूँ। अब मुझे केवल सुख ही सुख मिल रहा है॥ 50॥
 
‘Just as people enter a lake with cool water during summer, similarly, now I am established in the Supreme Brahman, hence I am peaceful, I have attained nirvana from all sides. Now I am getting nothing but happiness.॥ 50॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)