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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 177: मङ्किगीता—धनकी तृष्णासे दु:ख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति
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श्लोक 48
श्लोक
12.177.48
यद् यत् त्यजति कामानां तत् सुखस्याभिपूर्यते।
कामस्य वशगो नित्यं दु:खमेव प्रपद्यते॥ ४८॥
अनुवाद
‘मनुष्य जिस-जिस कामना का त्याग करता है, उसी से सुखी होता है। कामना के वश में होकर वह सदैव दुःख भोगता है।॥48॥
‘Every desire a man gives up, he becomes happy with it. Under the influence of desire he always experiences misery.॥ 48॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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