श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 177: मङ्किगीता—धनकी तृष्णासे दु:ख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  12.177.46 
तस्मात् कामश्च लोभश्च तृष्णा कार्पण्यमेव च।
त्यजन्तु मां प्रतिष्ठन्तं सत्त्वस्थो ह्यस्मि साम्प्रतम्॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
अतः मोक्ष की ओर अग्रसर होने वाले मुझ साधक को काम, लोभ, तृष्णा और कृपणता त्याग देनी चाहिए। अब मैं सत्त्वगुण में स्थित हूँ। 46॥
 
'Therefore, lust, greed, thirst and miserliness should leave me, the seeker who is moving towards salvation. Now I am situated in Sattva Guna. 46॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)