श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 177: मङ्किगीता—धनकी तृष्णासे दु:ख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  12.177.45 
निर्वेदं निर्वृतिं तृप्तिं शान्तिं सत्यं दमं क्षमाम्।
सर्वभूतदयां चैव विद्धि मां समुपागतम्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
तुम भलीभाँति समझ लो कि मैंने त्याग, सुख, संतोष, शान्ति, सत्य, बल, क्षमा और समस्त प्राणियों पर दया प्राप्त कर ली है।’ 45॥
 
'You should understand well that I have attained renunciation, happiness, contentment, peace, truth, strength, forgiveness and compassion towards all living beings.' 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)