श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 177: मङ्किगीता—धनकी तृष्णासे दु:ख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  12.177.44 
तृप्त: स्वस्थेन्द्रियो नित्यं यथालब्धेन वर्तयन्।
न सकामं करिष्यामि त्वामहं शत्रुमात्मन:॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
मैं सदैव संतुष्ट रहूँगा, स्वस्थ इन्द्रियों से युक्त रहूँगा और जो कुछ संयोग से मिल जाए, उसी से जीवन निर्वाह करूँगा; परन्तु मैं तुम्हें कभी सफल नहीं होने दूँगा; क्योंकि तुम मेरे शत्रु हो॥ 44॥
 
‘I will always be content and endowed with healthy senses and will continue to live on whatever I get by chance; but I will never let you succeed; because you are my enemy.॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)