श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 177: मङ्किगीता—धनकी तृष्णासे दु:ख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  12.177.43 
क्षमिष्ये क्षिपमाणानां न हिंसिष्ये विहिंसित:।
द्वेष्ययुक्त: प्रियं वक्ष्याम्यनादृत्य तदप्रियम्॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
अब मैं उन लोगों के व्यवहार को चुपचाप सहन कर लूँगा जो मेरी निन्दा करेंगे या मेरा अपमान करेंगे । जो मुझे मारेंगे या मुझे कष्ट देंगे, उनसे मैं प्रतिशोध नहीं लूँगा । यदि कोई द्वेषपूर्ण व्यक्ति भी मेरे साथ आ जाए और वह मुझे अप्रिय वचन कहने लगे, तो भी मैं उसकी उपेक्षा करूँगा और उसे अप्रिय वचन नहीं कहूँगा ॥ 43॥
 
‘Now I will silently tolerate the behaviour of those who will criticise me or insult me. I will not retaliate against those who will beat me or torment me. Even if a person worthy of hatred joins me and he starts saying unpleasant words to me, I will ignore him and will not say unpleasant words to him.॥ 43॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)