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mahabharat 12.177.41: पहले मुझे बड़े दुःख होते थे, परन्तु मैं इतना मूर्ख हो गया था कि धन की इच्छा में दुःख होता है, यह समझ ही नहीं पाता था। परन्तु अब धन के नाश के कारण उससे रहित होकर मैं शरीर के सभी अंगों में दुःख और चिन्ता से रहित होकर सुखपूर्वक सोता हूँ॥ 41॥   |   mahabharat अध्याय 12.177: मङ्किगीता—धनकी तृष्णासे दु:ख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 177: मङ्किगीता—धनकी तृष्णासे दु:ख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  12.177.41 
अतिक्लेशान् सहामीह नाहं बुद्धॺाम्यबुद्धिमान्।
निकृतो धननाशेन शये सर्वाङ्गविज्वर:॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
पहले मुझे बड़े दुःख होते थे, परन्तु मैं इतना मूर्ख हो गया था कि धन की इच्छा में दुःख होता है, यह समझ ही नहीं पाता था। परन्तु अब धन के नाश के कारण उससे रहित होकर मैं शरीर के सभी अंगों में दुःख और चिन्ता से रहित होकर सुखपूर्वक सोता हूँ॥ 41॥
 
‘Earlier I used to suffer great pains, but I had become so foolish that I could not understand that there is pain in the desire for wealth. But now, being deprived of wealth due to its destruction, I am free from pain and worries in all my body parts and sleep peacefully.॥ 41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)