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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 177: मङ्किगीता—धनकी तृष्णासे दु:ख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति
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श्लोक 40
श्लोक
12.177.40
निर्वेदमहमासाद्य द्रव्यनाशाद् यदृच्छया।
निर्वृत्तिं परमां प्राप्य नाद्य कामान् विचिन्तये॥ ४०॥
अनुवाद
‘अचानक धन की हानि होने से मैंने वैराग्य प्राप्त करके परम सुख प्राप्त कर लिया है। अब मैं सांसारिक सुखों का चिन्तन नहीं करूँगा।॥40॥
‘Due to the sudden loss of wealth, I have attained supreme happiness by attaining detachment. Now I will not think of worldly pleasures.॥ 40॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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