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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 177: मङ्किगीता—धनकी तृष्णासे दु:ख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति
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श्लोक 39
श्लोक
12.177.39
पाताल इव दुष्पूरो मां दु:खैर्योक्तुमिच्छसि।
नाहमद्य समावेष्टुं शक्य: काम पुनस्त्वया॥ ३९॥
अनुवाद
काम! तुम पाताल के समान दुर्गम हो। तुम मुझे दुःखों में फँसाना चाहते हो; किन्तु अब तुम मुझमें पुनः प्रवेश नहीं कर सकते॥39॥
‘Kama! You are as difficult to fill as the netherworld. You want to ensnare me in sorrows; but now you cannot enter me again.॥ 39॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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