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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 177: मङ्किगीता—धनकी तृष्णासे दु:ख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति
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श्लोक 37
श्लोक
12.177.37
अर्थलोलुपता दु:खमिति बुद्धं चिरान्मया।
यद् यदालम्बसे काम तत्तदेवानुरुध्यसे॥ ३७॥
अनुवाद
धन का लोभ ही दुःख का कारण है, यह बात मुझे बहुत समय बाद समझ में आई है। काम! तू जिसकी भी शरण लेता है, अन्त में उसी के पीछे भागता है। 37।
‘Greed for money is the cause of misery, I have realized this after a long time. Kama! Whomsoever you take shelter of, you end up chasing them. 37.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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