श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 177: मङ्किगीता—धनकी तृष्णासे दु:ख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  12.177.35 
अवज्ञानसहस्रैस्तु दोषा: कष्टतराऽधने।
धने सुखकला या तु सापि दु:खैर्विधीयते॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
दरिद्र को हजारों अपमान सहने पड़ते हैं; इसलिए दरिद्र अवस्था में अनेक दुःखदायी दोष होते हैं; तथा जो सुख धन में प्रकट होता है, वह भी दुःखों से ही प्राप्त होता है॥ 35॥
 
‘The poor have to endure thousands of insults; hence the poverty-stricken state has many painful defects; and the trace of happiness which appears in wealth is also achieved through sorrows.॥ 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)