Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.177.34: मैं मानता हूँ कि सबसे बड़ा दुःख वह है जो धन के नष्ट हो जाने पर होता है; क्योंकि जो धन से वंचित हो जाता है, उसका अपने भाई-बन्धु और मित्र भी अपमान करते हैं॥ 34॥ | mahabharat अध्याय 12.177: मङ्किगीता—धनकी तृष्णासे दु:ख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
धननाशेऽधिकं दु:खं मन्ये सर्वमहत्तरम्।
ज्ञातयो ह्यवमन्यन्ते मित्राणि च धनाच्च्युतम्॥ ३४॥
अनुवाद
मैं मानता हूँ कि सबसे बड़ा दुःख वह है जो धन के नष्ट हो जाने पर होता है; क्योंकि जो धन से वंचित हो जाता है, उसका अपने भाई-बन्धु और मित्र भी अपमान करते हैं॥ 34॥
‘I believe that the greatest sorrow is the one which comes when one's wealth is destroyed; because the one who is deprived of wealth is insulted even by his own siblings and friends.॥ 34॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥