श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 177: मङ्किगीता—धनकी तृष्णासे दु:ख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति  »  श्लोक 31-32
 
 
श्लोक  12.177.31-32 
सर्वभूतान्यहं देहे पश्यन् मनसि चात्मन:।
योगे बुद्धिं श्रुते सत्त्वं मनो ब्रह्मणि धारयन्॥ ३१॥
विहरिष्याम्यनासक्त: सुखी लोकान् निरामय:।
यया मां त्वं पुनर्नैवं दु:खेषु प्रणिधास्यसि॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
मैं अपने शरीर और मन में स्थित सम्पूर्ण भूतों को देखता हुआ योग में मन को, श्रवण-ध्यान आदि में एकाग्र मन को तथा परमेश्वर में मन को एकाग्र करके रोग-शोक से रहित और सुखी हो जाऊँगा तथा आसक्तिरहित होकर सम्पूर्ण लोकों में विचरण करूँगा, जिससे आप मुझे फिर ऐसे दुःख में न डाल सकेंगे ॥31-32॥
 
'Looking at all the ghosts in my body and mind, I will concentrate my mind in yoga, my concentrated mind in listening-meditation etc. and my mind in the Supreme God, free from diseases and sorrows and happy and will roam around in all the worlds with no attachment, so that you will not be able to put me in such sorrow again. 31-32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)