श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 177: मङ्किगीता—धनकी तृष्णासे दु:ख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  12.177.30 
न युष्मास्विह मे प्रीति: कामलोभानुसारिषु।
तस्मादुत्सृज्य कामान् वै सत्त्वमेवाश्रयाम्यहम्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
हे पंचभूतगण! आप सभी लोग अहंकार आदि से युक्त होकर काम और लोभ का अनुसरण कर रहे हैं। इसलिए यहाँ मुझमें आप लोगों के प्रति लेशमात्र भी प्रेम नहीं है। इसीलिए अब मैं समस्त कामनाओं का परित्याग करके केवल सत्त्वगुण की शरण में जा रहा हूँ ॥30॥
 
'O Panchabhutgana! All of you are following lust and greed with ego etc. Therefore I do not have even an iota of love for you here. That is why I am now abandoning all desires and taking refuge in Sattva Guna only. ॥ 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)