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mahabharat 12.177.29: मेरे शरीर में आश्रय लिए हुए पंचतत्वों का समूह चाहे अपनी इच्छा से इससे दूर चला जाए अथवा इसमें रहे, इससे मेरा कोई सरोकार नहीं है ॥29॥   |   mahabharat अध्याय 12.177: मङ्किगीता—धनकी तृष्णासे दु:ख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 177: मङ्किगीता—धनकी तृष्णासे दु:ख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  12.177.29 
य इमं मामकं देहं भूतग्राम: समाश्रित:।
स यात्वितो यथाकामं वसतां वा यथासुखम्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
मेरे शरीर में आश्रय लिए हुए पंचतत्वों का समूह चाहे अपनी इच्छा से इससे दूर चला जाए अथवा इसमें रहे, इससे मेरा कोई सरोकार नहीं है ॥29॥
 
'The group of five elements which have taken shelter in my body, whether they go away from it according to their wish or stay in it, it is not my concern. ॥ 29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)