श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 177: मङ्किगीता—धनकी तृष्णासे दु:ख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  12.177.28 
अनुतर्षुल एवार्थ: स्वादु गाङ्गमिवोदकम्।
मद्विलापनमेतत्तु प्रतिबुद्धोऽस्मि संत्यज॥ २८॥
 
 
अनुवाद
काम! यह धन गंगा के सुहावने जल के समान काम को ही बढ़ाता है। मैं भली-भाँति जान गया हूँ कि यह काम की वृद्धि ही मेरे नाश का कारण है; अतः आप मेरे शरीर को त्याग दीजिए॥ 28॥
 
‘Kama! This wealth, like the delicious water of the Ganges, only increases desire. I have come to know very well that this increase in desire is the cause of my destruction; therefore, please leave my body.॥ 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)