श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 177: मङ्किगीता—धनकी तृष्णासे दु:ख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  12.177.27 
परित्यागे न लभते ततो दु:खतरं नु किम्।
न च तुष्यति लब्धेन भूय एव च मार्गति॥ २७॥
 
 
अनुवाद
‘जब मनुष्य को शरीर त्यागने पर भी धन नहीं मिलता, तो उसके लिए इससे बड़ा दुःख क्या हो सकता है? यदि धन मिल भी जाए, तो वह उससे संतुष्ट नहीं होता, वरन् और अधिक धन की खोज में लग जाता है।॥27॥
 
‘What can be a greater sorrow for a man when he does not get wealth even after sacrificing his body? Even if he gets wealth, he is not satisfied with that much but starts searching for more wealth.॥ 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)